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मणिकर्णिका द क्वीन ऑफ झांसी : फिल्म समीक्षा

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यह फिल्म उन शहीदों के लिए देखी जा सकती है जिनकी सोच थी ‘मैं रहूं ना रहूं भारत रहना चाहिए।’

निर्माता : ज़ी स्टूडियोज़, कमल जैन

निर्देशक : राधा कृष्ण जगरलामुडी और कंगना रनौट

संगीत : शंकर-अहसान-लॉय

कलाकार : कंगना रनौट, जीशू सेनगुप्ता, सुरेश ओबेरॉय, डैनी, अतुल कुलकर्णी, अंकिता लोखंडे, मिष्टी, ज़ीशान अय्यूब, कुलभूषण खरबंदा

सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 28 मिनट

रेटिंग : 3/5

आज भी जब ज्यादातर महिलाओं की जिंदगी रसोई के इर्दगिर्द सिमटी हुई है और उन्हें फैसले लेने का हक भी नहीं है तो यह कल्पना करना कठिन है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व एक महिला ने तमाम बंधनों को तोड़ कर अंग्रेजों से युद्ध लड़ा था। इसीलिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम आजादी की लड़ाई लड़ने वाले वीरों के साथ सम्मानपूर्वक लिया जाता है। ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी’ वाली लाइन सभी को याद है।


इतने बड़े किरदार को लेकर फिल्म बनाना आसान नहीं है क्योंकि किसी तरह का कोई समझौता फिल्म मेकिंग में नहीं किया जा सकता। बजट, कॉस्ट्यूम, अभिनय, इतिहास के साथ-साथ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना पड़ता है। ‘मणिकर्णिका : द क्वीन ऑफ झांसी’ में राधा कृष्ण जगरलामुडी और कंगना रनौट ने निर्देशित की है और इसे के. विजयेन्द्र प्रसाद ने लिखा है जो बाहुबली और बजरंगी भाईजान जैसी फिल्में लिख चुके हैं। रानी लक्ष्मीबाई का शादी के पूर्व नाम मणिकर्णिका था और इसी नाम पर फिल्म आधारित है।


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फिल्म की शुरुआत उम्दा है जब मणिकर्णिका शेर का शिकार करती है। दिखाया गया है कि वह घुड़सवारी में माहिर है और तलवारबाजी में एक साथ कई लोगों को परास्त करने की ताकत रखती है। बिजली-सी उसमें स्फूर्ति है और नदी के पानी की तरह वह चंचल है। कंगना रनौट पहली फ्रेम से ही मणिकर्णिका लगने लगती है और दर्शक फिल्म से जुड़ जाते हैं।


गंगाधर राव से शादी करने के बाद मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मीबाई हो जाता है और वह झांसी आ जाती हैं। अंग्रेज धीरे-धीरे भारत पर कब्जा जमाते जा रहे थे और झांसी पर भी उनका शिकंजा कसता जा रहा था। लक्ष्मीबाई अपने बेटे आनंदराव और पति गंगाधरराव को खो देती है। दामोदरराव उनका दत्तक पुत्र था। विधवा होकर काशी में जीवन व्यतीत करने के बजाय लक्ष्मीबाई सारे कुरीतियों के खिलाफ होकर झांसी की गद्दी पर बैठती हैं और अंग्रेजों से संघर्ष करती हैं।


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अच्छी शुरुआत के बाद फिल्म बीच में लड़खड़ा जाती है। इस तरह की फिल्म में ड्रामा जबरदस्त होना चाहिए। इमोशन कूट-कूट कर भरे होने चाहिए और डायलॉग ऐसे हों जो तालियां पीटने पर मजबूर करे। इस तरह के सीन हैं, लेकिन संख्या कम है, यही बात फिल्म के मध्य में अखरती है। ड्रामा, एक्शन और इमोशन का अनुपात थोड़ा बिगड़ जाता है।


फिल्म थोड़ी दिशा भी भटक जाती है। बस्ती में जाकर रानी लक्ष्मीबाई डांस करने लगती हैं, गाना गाती हैं, यह अजीब लगता है। अंग्रेजों से गाय का बछड़ा छुड़ाने वाले जैसे दृश्य रानी को ‘हीरो’ की तरह पेश करने के लिए रचे गए हैं, लेकिन ये फिल्म को कमजोर करते हैं। ‘सिनेमेटिक लिबर्टी’ के नाम पर ली गई छूट फिल्म को पीछे धकेलती है। चूंकि फिल्मेकर ने पहले ही कह दिया है कि उसने कुछ छूट ली है इसलिए यह कहना कठिन है कि ऐसा सही में हुआ है या नहीं।


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फिल्म आखिरी के आधे घंटे में फिर रफ्तार पकड़ती है जब रानी लक्ष्मीबाई झांसी खोने के बाद ग्वालियर पर कब्जा करती है। यह सीक्वेंस बहुत अच्छे से फिल्माया गया है और क्लाइमैक्स में दिखाया गया युद्ध फिल्म को ऊंचाइयों पर ले जाता है। आंखें नम हो जाती है उन शहीदों के लिए जिन्होंने भारत के लिए जान देने के पहले पल भर भी नहीं सोचा।


निर्देशकों ने फिल्म का प्रस्तुतिकरण बिलकुल सीधा रखा है। एक के बाद एक घटनाक्रम उन्होंने जमा दिए और ज्यादा ट्विस्ट और टर्न नहीं डाले। साथ ही फिल्म में कंगना पर बहुत ज्यादा फोकस किया है। नि:संदेह कंगना बेहतरीन एक्ट्रेस हैं, लेकिन दूसरे किरदारों को भी उभरने का मौका दिया जाना चाहिए था। डैनी, अतुल कुलकर्णी, ज़ीशान अय्यूब सहित अन्य पात्र साइड लाइन पर खड़े नजर आते हैं।


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फिल्म के कुछ गाने अच्छे हैं। प्रसून जोशी के बोल अच्छे हैं, लेकिन कुछ गानों की जगह नहीं बनती। संवाद और दमदार होने चाहिए थे। फिल्म के एक्शन सीन उम्दा हैं। बजट की कमी का असर भी फिल्म में कहीं-कहीं नजर आता है।


कंगना रनौट पूरी फिल्म में छाई हुई हैं। रानी लक्ष्मीबाई के किरदार को उन्होंने विश्वसनीय बनाया है और दर्शक पहली फ्रेम से ही उन्हें रानी मानने लगते हैं। तलवारबाजी और घुड़सवारी के दृश्य उन्होंने इतने आत्मविश्वास के साथ किए हों मानो वे इसमें पारंगत हों। अंग्रेजों के खिलाफ वाले दृश्यों में स्वाभिमान उनके चेहरे पर दमकता है। युद्ध वाले दृश्यों में सिंहनी भी भांति नजर आती हैं।
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